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“ ज्ञान वो सबसे शक्तिशाली हथियार है जिससे आप पूरी दुनिया बदल सकते हैं” --नेल्सन मंडेला

दर्शन का शिक्षक के व्यक्तित्व- तथा उसके व्यवहार से घनिष्ठ समबन्ध होता है | यदि ध्यान से देखा जाये तो पता चलेगा कि शिक्षक ही नहीं होता अपितु वह स्वयं एक दार्शनिक भी होता है | इसका कारण यह है कि प्रत्येक शिक्षक का अपने जीवन के प्रति एक उदेश्य होता है | उसके कुछ आदर्श मूल्य तथा धारणायें होती है जिनकी महानता से उसे अटल विश्वास होता है | शिक्षा प्रक्दन करते समय वह बार-बार उन आदर्शों तथा म्य्ल्यों पर प्रकाश डालता है जिससे कक्षा के बालकों को उनकी महानता में विश्वास को जाये तथा वे उनको प्राप्त करने के लिए तत्पर हो जायें | इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्रत्येक शिक्षक एक दर्शानिक होता है जो अपने दर्शन से कक्षा के बालकों को पग-पग पर प्रभावित करता रहता है | चूँकि शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षक का महत्वपूर्ण- स्थान है, इसलिए उसकी दार्शनिक विचारधारा का प्रभाव शिक्षा के विभिन्न अंगों पर अवश्य पड़ता है | दूसरे शब्दों में, शिक्षक के विचारों तथा देश की आवश्यकताओं- में अनुरूपता का होना परम आवश्यक है | तब ही देश तथा उसके भावी नागरिकों की उन्नति सम्भव हो सकती है | ऐसी स्थिति में प्रत्येक शिक्षक को चाहिये कि वह अपनी शैक्षिक योग्यता में वृधि करता रहे जिससे उसको प्रकृति, जीवन तथा ईश्वर का ज्ञान हो जाये और उसमें अनके समाजाजिक तथा नैतित्क गुणों का विकास हो जाये | इन गुणों के विकसति हो जाने से - शिक्षा हमारे समाज की आत्मा है जो कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दी जाती है -चरित्र निखर जायेगा तथा उसका व्यक्तित्व- इतना प्रभावशाली- बन जायेगा कि उसके सम्पर्क में आकर बालकों के व्यक्तितिव- का वांछनीय विकास होना निश्चित है | शिक्षक को यह भी चाहिये कि विभिन्न विचारधाराओ- ं का गहन अध्ययन करता रहे तथा अपनी आलोचनात्मक- , तार्किक तथा अन्वेषणनात- ्मक शक्ति के द्वारा इनमें से देश तथा काल की आवशयकताओं के अनुसार उपयुक्त विचारों का चयन करे तथा उनके अनुसार शिक्षा की प्रक्रिया संचालित करता रहे | जिस शिक्षक के जीवन का कोई उद्देश्य नहीं होता वह कक्षा के बालकों के सामने किसी आदर्श को पस्तुत नहीं कर सकता | ऐसे आदर्श-विही- शिक्षक के द्वारा प्रदान की हुई शिक्षा निरथर्क है उक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षक स्वयं एक दार्शनिक है तथा उसके द्वारा प्रदान की हुई शिक्षा दर्शन है | अत: हम कह सकते हैं कि दर्शन तथा शिक्षक का घनिष्ठ समबन्ध है |

 

इस अध्याय में हमने दर्शन तथा शिक्षक के समबन्ध पर प्रकाश डालते हुए देखा कि शिक्षा के विभिन्न अंगों का दर्शन से घनिष्ठ सम्बन्ध है | दूसरे शब्दों में, शिक्षा को मार्ग न दिखाये तो शिक्षा अर्थहीन हो जायेगी | अत: जेंटायिल के शब्दों में – “ जो व्यक्ति इस बात में विश्वास रखते हैं कि दर्शन से सम्बन्ध बनाये बिना शिक्षा की प्रक्रिया उत्तम रीति से चल सकती है, वे शिक्षा के विशुद्ध स्वरुप को समझने में असमर्थता प्रकट करते हैं शिक्षा की प्रक्रिया दर्शन की सहायता के बिना उचित मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सकती “

दर्शन का शाब्दिक अर्थ – दर्शन अंग्रेजी भाषा के ‘फिलोस्फी’- शब्द का रूपांतर है | इस शब्द की उत्पति ग्रीक के दो शब्दों ‘फिलोस’ तथा ‘सोफिया’ से हुई है | ‘फिलोस’ का अर्थ है प्रेम अथवा अनुराग और ‘सोफिया’ का अर्थ है –ज्ञान | इस प्रकार ‘फिलोस्फी’- अर्थात दर्शन का शाब्दिक अर्थ का ज्ञान अनुराग अथवा ज्ञान का प्रेम है | इस दृष्टि से ज्ञान तथा सत्य की खोज करना तथा उसके वास्तविकता- स्वरूप को समझने की कला को दर्शन कहते हैं तथा किसी कार्य करने से पूर्व इस कला को प्रयोग करने वाले व्यक्ति को दार्शनिक की संज्ञा दी जाती है | प्लेटो ने अपनी पुस्तक रिपब्लिक में लिखा है – “ जो व्यक्ति ज्ञान को प्राप्त करने तथा नई-नई बातों को जानने के लिए रूचि प्रकट करता है तथा जो कभी संतुष्ट नहीं होता, उसे दार्शनिक कहा जाता है |”

शिक्षा जड़ नहीं अपितु एक चेतन तथा स्वेच्छित द्विमुखी प्रक्रिया है | इस दृष्टि से शिक्षा के लिए दो व्यक्तियों- का होना परम आवश्यक है – एक शिक्षक और दूसरा बालक | शिक्षक के कुछ आदर्श, मूल्य तथा विश्वास होते हैं और बालक इन सबसे प्रभावित होता है | दूसरे शब्दों में, शिक्षक एक दार्शनिक है जो अपने दर्शन के अनुसार बालक के जीवन के विभिन्न पक्षों को विकसित करके वांछित लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करता है | इस प्रकार शिक्षा का प्रत्यक्ष साधन है जिसके द्वारा दर्शन के निर्धारित किये गये लक्ष्यों को प्राप्त किया जाता है | एडम्स ने ठीक ही लिखा है – “ शिक्षक दर्शन का क्रियाशील पक्ष है | यही दार्शनिक चिन्तन का एक सक्रिय पहलू है |”

दर्शन तथा शिक्षा की अलग-अलग व्याख्या करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि दोनों का लक्ष्य व्यक्ति को सत्य का ज्ञान कराना तथा उसके जीवन को विकसित करना है | ऐसी दशा में यह कहना उचित ही होगा कि दर्शन तथा शिक्षा का घनिष्ठ सम्बन्ध ही नहीं है अपितु दोनों एक-दूसरे पर आश्रित भी हैं | निम्नलिखित- पंकियों में हम दर्शन तथा शिक्षा के सम्बन्ध को स्पष्ट करने के लिए उन तथ्यों पर प्रकाश डाल रहें हिं जिनके कारण शिक्षा दर्शन पर आश्रित रहती है तथा दर्शन को शिक्षा का सहारा लेना पड़ता है |

(1) दर्शन जीवन के उस वास्तविक लक्ष्य को निर्धारित करता है जिसे शिक्षा को प्राप्त करना है – शिक्षा एक चेतन तथा स्वेच्छित ऐसी प्रक्रिया है जिसको उचित रूप से संचालित करने के लिए उचित मार्गदर्शन- के शिक्षा अपने लक्ष्य को कदापि प्राप्त नहीं कर सकती | दर्शन जीवन के वास्तविक लक्ष्य को निर्धारित करता है तथा उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शिक्षा का उचित मार्गदर्शन- भी करता है | बिना दर्शन की सहयता के शिक्षा की कोई योजना सतय तथा उपयोगी नहीं हो सकती | अत: स्पेंसर के शब्दों में – “ वास्तविक शिक्षा का संचालन वास्तविक दर्शन की कर सकता है |”

(2) दर्शन शिक्षा के विभिन्न अंगो को प्रभावित करता है – कुछ विद्वानों का मत है कि दर्शन का सम्बन्ध केवल सूक्षम बातों से ही है तथा शिक्षा का स्थूल तथा व्यवहारिक से | अत: दर्शन और शिक्षा दोनों अलग-अलग है | इनका आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है | दर्शन और शिक्षा को अलग-अलग बताना तथा यह कहना कि इन दोनों में कोई सम्बन्ध नहीं है, बहुत बढ़ी भूल है | वस्तुस्थित- ि यह है दर्शन और शिक्षा का इनता घनिष्ठ समबन्ध है कि दोनों को किसी भी हालत में अलग नहीं किया जा सकता | यदि ध्यान से देखा जाये तो पाता चलेगा कि उन विचित्र दार्शनिक विचारधाराओ- ं का ही तो प्रभाव है जिन्होंने समय-समय पर शिक्षा के विभिन्न अंगों को प्रभावित किया है, कर रही है तथा आगे भी करती रहेंगी | जे०एस०रास ने ठीक ही लिखा है –“दर्शन तथा शिक्षा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जो एक ही वस्तु के विभिन्न दृष्टिकोण को प्रस्तुत करते हैं वे एक दूसरे पर अंतनिर्हित- हैं |”

(3) महान दार्शनिक महान शिक्षा-शास- त्री भी हुए हैं – इतिहास इस बात का साक्षी है कि प्रत्येक समय के महान दार्शनिक ही महान शिक्षाशास्- त्री भी हुए हैं | प्लेटो, सुकरात, लॉक , कमेनियस, रूसो, फ्रेब्रिल, डीवी , गाँधी, टैगोर, तथा अरविन्द घोष आदि महान दार्शनिक के उदहारण इस बात की पुष्टि के लिए प्रस्तुत किए जा सकते हैं | ये सब महान दार्शनिक महान शिक्षाशास्- त्री भी हुए हैं | इन महान दार्शनिक द्वारा लिखे हुए ग्रन्थ केवल दर्शनशास्त- ्र की ही महान कृतियाँ नहीं रही अपितु इनका शिक्षा के क्षेत्र में भी विशेष महत्त्व है | उक्त सभी दार्शनिकों- ने अपने-अपने दर्शन को क्रियात्मक- अथवा व्यवहारिक रूप देने के लिए अन्त में शिक्षा का ही सहारा लिया |

(1) शिक्षा दर्शन का गत्यात्मक साधन है – किसी कार्य को पूरा करने के लिए दो बातों की आवश्यकता होती है – (1) विचार अथवा योजना, तथा (2) प्रयोग अथवा व्यवहार | दर्शन योजना अथवा विचार पक्ष है तथा शिक्षा, व्यवहार अथवा प्रयोगात्म- क पक्ष है | दूसरे शब्दों में, दर्शन जीवन के लक्ष्य को निर्धारित करता है तथा विचार अथवा विश्लेषण करके सिधान्तों का निर्माण करता है | शिक्षा इन सिधान्तों व्यवहार अथवा प्रयोग में लाती है | कहने का तात्पर्य यह है कि शिक्षा सैधान्तिकत- ा को व्यावहारिक- ता में बदलती है | चूँकि शिक्षा का कार्य व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन लाना है, इसलिए एडम्स के शब्दों में – “ शिक्षा दर्शन का गत्यात्मक साधन है |”

(2) शिक्षा लक्ष्य को प्राप्त करने का एक साधन है – यदि दर्शन जीवन के लक्ष्य को निर्धारित करता है, तो शिक्षा उस लक्ष्य को प्राप्त करने का एक साधन है | हरबार्ट का भी यह मत है –“ जब तक समस्त दार्शनिक समस्याओं को व्यवहारिक रूप नहीं दिया जायेगा तब तक शिक्षा को चैन नहीं आ सकता |” उपर्युत्क कारणों के अतिरिक्त शिक्षाशास्- त्री समय-समय पर दार्शनिकों- के सम्मुख प्राय: ऐसी नयी-नयी तथा पेचीदा समस्याओं को सुलझाने के लिए प्रस्तुत करते रहते हैं जो उनको अध्यापन कार्य करते समय खटकती रहती है | इस प्रकार शिक्षा नये दर्शन को जन्म देती है | संक्षेप में, दर्शन तथा शिक्षा का घनिष्ठ सम्बन्ध है | अब हम निम्नलिखित- पंक्तियों में इस बात पर प्रकाश डाल रहे हैं कि दर्शन का शिक्षा का उदेश्यों, पाठ्यक्रमो- ं, शिक्षण-विध- यों, अनुशासन तथा पाठ्य-पुस्- कों आदि विभिन्न अंगों पर क्या प्रभाव पड़ता है |